Showing posts with label International. Show all posts
Showing posts with label International. Show all posts

दक्षिण एशिया सैटेलाइट

अंतरिक्ष विज्ञान और प्रौधोगिकी (Technology) के क्षेत्र में पडोसी देशों के साथ विशेषज्ञता साझा करने की दिशा में भारत द्वारा लॉन्च किया गया 'दक्षिण एशिया सैटेलाइट' अंतरिक्ष तकनिकी के साथ-साथ विदेश नीति के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है.
भारत ने वर्ष 2014 के काठमांडू (नेपाल) सम्मलेन में SAARC सैटेलाइट को लॉन्च करने के बारे में घोषणा की थी.इसकी घोषणा भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा 18वें सार्क सम्मलेन में की गयी थी.

इस सैटेलाइट को दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (SAARC) के क्षेत्रों के लिए लॉन्च किया गया था. परन्तु पाकिस्तान द्वारा इस सुविधा को नकारने के बाद यह पूर्ण रूप से सार्क के लिए नही रहा.

इस सैटेलाइट के 5 मई, 2017 को लॉन्च किया गया था. इसे GSLV-MK 2 Launch Vehical द्वारा सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र श्री हरिकोटा से लॉन्च किया गया था. ISRO द्वारा निर्मित किये जाने वाले इस सैटेलाइट का कुल वजन लगभग 2230 kg. है और इसमें 12KU-बैंड के Transponder लगे है. दक्षिण एशियाई सैटेलाइट (GSAT-9) एक Geosynchronous संचार और मौसम विज्ञान संबंधी सैटेलाइट है. इस सैटेलाइट का जीवनकाल लगभग 12 साल से अधिक की अवधि का है. GSAT-9 के नाम से जाने जाना वाला यह सैटेलाइट दूरसंचार तथा प्रसारण अनुप्रयोगों के क्षेत्र में पूर्ण सीमा तक सुविधाएँ उपलब्ध कराने में सक्षम है.

South Asia Satellite launch by ISRO

भारत, अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, नेपाल, मालदीव और श्रीलंका आदि देश इस सैटेलाइट द्वारा प्रदान की जाने वाली बहुआयामी सुविधाओं के उपयोगकर्ता है.
SAARC या GSAT-9 एक Geosynchronous संचार और मौसम विज्ञान सैटेलाइट है.

सैटेलाइट के प्रयोग

यह दक्षिण एशियाई देशों के लिए संचार व्यवस्था तथा बाढ़ के समय एक-दूसरे के सहायता प्रदान करने में मदद प्रदान करेगा.

यह सैटेलाइट दक्षिण एशियाई देशों को DTH, VSAT तथा प्राकृतिक आपदा के विषय में बेहतर सूचनाएं प्रदान करने में मदद करेगा.

इसके अलावा यह TV, दूरस्थ- शिक्षा, Telemedicine तथा दूरसंचार सेवाएँ भी उपलब्ध कराएगा.

दक्षिण एशिया सैटेलाइट से  भारत को लाभ

सर्वप्रथम यह भारत की बढती तकनीकी कौशलता का प्रदर्शन करती है.

यह देशों को मौसम संबंधी पूर्वानुमान, Telemedicine, संचार तथा प्रसारण आदि में सुविधा प्रदान करेगा.

चीन की योजना थी कि वह दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र के लिए एक क्लाउड का प्रक्षेपण करेगा, लेकिन भारत ने पहले ही सार्क सैटेलाइट का लॉन्च कर एक बुद्धिमानी भरा कार्य किया है.

भारत ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि दक्षिण एशियाई देशों में वह एकमात्र ऐसा देश है जिसने स्वदेश में विकसित Launch Vehical द्वारा स्वतंत्र रूप से सैटेलाइट का प्रक्षेपण किया है.

चंद्रयान मिशन, मंगलयान मिशन तथा दक्षिण-एशिया सैटेलाइट स्वदेशी तकनीक की विकास की क्षमता को रेखांकित करते है.

जिस समय भारत के पडोसी देश अपने अंतरिक्ष कार्यक्रमों के लिए चीन से मदद लेने की कोशिश में है तब यह भारत द्वारा सही समय उठाया गया एक सही कदम है.

B.R.I.C.S क्या है?

B.R.I.C.S की स्थापना की पहल 2006 में चार देशों - ब्राज़ील, रूस, भारत तथा चीन द्वारा की गयी थी. इन्ही देशों नाम के पहले अक्षरों के आधार पर इसका B.R.I.C (ब्रिक) नाम रखा गया. बाद में 2010 में दक्षिण अफ्रीका के शामिल हों जाने के बाद इसका वर्तमान नाम B.R.I.C.S (ब्रिक्स) हो गया. B.R.I.C.S  अर्थात् Brazil, Russia, India, China तथा South Africa विश्व के ऐसे पांच देशो का संगठन है, जिन्हें विश्व की उभरती हुई आर्थिक शक्तियां की संज्ञा दी जाती है. B.R.I.C.S  देशो का पहला शिखर सम्मलेन 2009 में आयोजित किया गया था, लेकिन B.R.I.C.S की शुरुआत 2006 में हुई थी. 

ब्रिक्स का विचार सबसे पहले वित्तीय सलाहकार कम्पनी गोल्डमेन सैक (Goldmen Sech) के अर्थशास्त्री जिम ओ नील ने 2003 में दिया था. जिम ओ नील ने ब्रिक का विचार 2003 में प्रकाशित अपनी report "Dreaming with BRICS: The path to 2050" में दिया था. उनके अनुसार चार देशो- Brazil, Russia, India, China की विकास क्षमता इतनी अधिक है कि 2050 तक ये देश विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं होगे. वर्तमान में अमेरिका तथा यूरोपियन संघ की अर्थव्यवस्थाएं विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं है. इस report के अनुसार चीन तथा भारत वस्तुओं तथा सेवाओ के उत्पादन में विश्व के सबसे बड़े निर्माताओं के रूप में उभर रहे है. वही दूसरी ओर रूस व ब्राज़ील विश्व के कच्चे माल के सबसे बड़े आपूर्तिकर्ता के रूप में उभर रहे है. 

आज B.R.I.C.S ने अपने अस्तित्व के एक दशक पुरे कर लिए है. ब्रिक्स के पांच सदस्य देशों की कुल जनसँख्या 3.6 बिलियन है, जो विश्व की कुल जनसँख्या का 40% है. इसी प्रकार इन पांच देशों का घरेलू उत्पाद 16.6 ट्रिलियन डॉलर है, जो विश्व के सकल घरेलू उत्पाद का 22% है. इन आंकड़ों के आधार पर ब्रिक्स देशों की अर्थव्यवस्था व विश्व में उसके महत्व का अनुमान लगाया जा सकता है.

Also read:- भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति और हालिया संशोधन

B.R.I.C.S  देशों के शिखर सम्मेलनों की सूची

ब्रिक्स देशों का नौवां शिखर सम्मलेन चीन के शहर जियामेन में 3-5 सितम्बर, 2017 को आयोजित किया गया था. इस सम्मलेन में भारत का प्रतिनिधित्व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा किया गया था. इस सम्मलेन में पाँचों देशों के अध्यक्षों ने भाग लिया था तथा आपसी सहयोग से जुड़े मुद्दों पर विचार-विमर्श किया था. इस शिखर सम्मलेन की मुख्य theme थी-"BRICS: Stronger Partnership for a Brighter Future".


ब्रिक्स (B.R.I.C.S) शिखर सम्मलेन
शिखर सम्मलेन
देश
स्थान
समय
पहला
रूस
येकैतारिन्बर्ग
16 June, 2009
दूसरा
ब्राज़ील
ब्रासिलिया
16 April, 2010
तीसरा
चीन
सान्या
14 April, 2011
चौथा
भारत
नई दिल्ली
29 March, 2012
पांचवा
दक्षिण अफ्रीका
डरबन
26-27 March, 2013
छठा
ब्राज़ील
फोर्टालेज़ा
14-17 July, 2014
सातवा
रूस
उफ़ा
8-9 July, 2015
आठवा
भारत
गोवा
14-15 October, 2016
नौवा
चीन
जियामेन
3-5 September, 2017
दसवां
दक्षिण अफ्रीका
प्रस्तावित
2018

ब्रिक्स का दसवां शिखर सम्मेलन दक्षिण अफ्रीका में होना अनुमानित है.

B.R.I.C.S (ब्रिक्स) के उद्देश्य (Objectives)

ब्रिक्स का अपना कोई संविधान नही है, लेकिन इसके सम्मेलनों के अंत में जारी घोषणा पत्रों के आधार पर इसके निम्नलिखित उद्देश्य माने जा सकते है:-

  • विभिन्न क्षेत्रों में सदस्य देशों के बीच पारस्परिक लाभकारी सहयोग को आगे बढाना, जिससे इन देशों में विकास को गति प्रदान की जा सके.
  • एक न्यायपूर्ण तथा समतापूर्ण विश्व व्यवस्था की स्थापना जो किसी एक समूह के प्रभुत्व में न होकर बहुपक्षीय प्रकृति की हो. इसका मन्तव्य पश्चिमी प्रभुत्व वाले वैश्विक व्यवस्था के स्थान पर एक नई बहुपक्षीय व्यवस्था की स्थापना करना है.
  • वर्तमान विश्व के प्रमुख मुद्दों जैसे जलवायु  परिवर्तन, आतंकवाद, विश्व व्यापार, आणविक ऊर्जा आदि का न्यायोचित समाधान.
  • विभिन्न वैश्विक मामलों में निर्णय निर्माण की प्रक्रिया का लोकतंत्रीकरण तथा इस दृष्टि से महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार, उदाहरण के लिए अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund) में कोटा सुधार की मांग. 

Also read:- 

BRICS की समीक्षा(Analysis)

B.R.I.C.S की उपलब्धियां

शीत युद्ध के बाद में अर्थव्यवस्था के आकार तथा विकास की क्षमता के आधार पर ब्रिक्स, विश्व का एक महत्वपूर्ण संगठन है. पिछले एक दशक में ही इस संगठन ने विश्व में आर्थिक परिदृश्य पर अपना एक महत्वपूर्ण स्थान बना लिया है. इसकी दो उपलब्धियां है-

प्रथम- ब्रिक्स ने पश्चिमी पूँजीवादी प्रभुत्व वाली वैश्विक व्यवस्था के स्थान पर एक बहुपक्षीय, खुली व   समतापूर्ण विश्वव्यवस्था के लिए निरंतर प्रयास किया है. World Bank के विकल्प के रूप में Development Bank की स्थापना इस दिशा में ठोस कदम है. 

दूसरा- ब्रिक्स के देशों ने आर्थिक, तकनीकी, व विकास के क्षेत्र में आपसी सहयोग को पिछले एक दशक में मजबूत किया है.

B.R.I.C.S की कमजोरियाँ

प्रथम- ब्रिक्स देशो की घोषित नीतियाँ तथा उनके वास्तविक व्यवहार में अंतर देखने में आया है. चीन ब्रिक्स के मंच से समेकित व लोकतान्त्रिक व्यवस्था की मांग उठाता है, लेकिन वही दक्षिण चीन सागर में वह अपने पड़ोसियों के ऊपर अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहता है. 

दूसरा-  ब्रिक्स देशो के बीच आपसी विवाद अत्यंत गहरे है. तथा उनके बीच अघोषित सामरिक प्रतियोगिता भी चल रही है. भारत तथा चीन के बीच सीमा-विवाद सहित अन्य मतभेद जगजाहिर है. इन  विवादों व कमजोरियों के कारण ब्रिक्स अपनी क्षमता व प्रयासों के अनुरूप सफलता अर्जित नही कर सका है.

पेरिस जलवायु समझौता का अर्थ

पेरिस जलवायु समझौता U.N.F.C.C.C के भीतर ग्रीन हाउस गैस के उत्सर्जन को कम करने के लिए कई देशो के द्वारा 2015 में किया गया प्रयास का प्रतिफल है. पेरिस समझौते में, प्रत्येक देश ग्लोबल वार्मिंग को कम करने के लिए स्वयं के योगदान को निर्धारित करता है. भारत समेत 171 देशो के प्रतिनिधियों ने पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौते को अपनी मंजूरी देते हुए इस पर हस्ताक्षर किये. जलवायु समझौते के तहत सभी सदस्य देशों ने 21वी सदी में दुनिया के तापमान में वृद्धि को 2 डिग्री से कम स्तर तक सीमित करने का लक्ष्य रखा है. संयुक्त राष्ट्र महासभा के सभागार में भारत की तरफ से उस समय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावडेकर (अब मानव संसाधन विकास मंत्री) ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किये. समझौते पर हस्ताक्षर के बाद सभी देशों को अपने देश की संसद से इस समझौते का अनुमोदन करना होगा. संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने उस अवसर पर कहा था की “ यह इतिहास में एक अहम् क्षण है. आज आप भविष्य से जुड़े एक संधि पत्र पर हस्ताक्षर कर रहे है.”


ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु समझौता

पेरिस समझौता बिजली के निर्माण से लेकर अन्य कई चीजों पर कड़ी नज़र रखेगा. जिनमे मुख्य होगा कि किस प्रकार से कुछ चुनिंदा अमीर देश बाढ़, सूखे और तूफ़ान जैसी प्राकृतिक आपदाओं से निबटने में गरीब राष्ट्रों की मदद करते है. वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन मानव जीवन के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ी चुनौती है. 18वी शताब्दी में प्रारंभ हुई औधोगिक क्रांति ने हमे मुख्यतः जीवाश्म ईंधन पर निर्भर बना दिया है और हम बिजली से लेकर कारखानों और कृषि तक पूरी तरह से इसी पर निर्भर है. लेकिन यह ईंधन बहुत बड़ी मात्रा में ऐसी गैसों का उत्सर्जन करते है, जो सूरज की ऊष्मा को पूरी तरह से धरती तक आने देती है. अतः यह ऊष्मा वायुमंडल में कैद हो जाती है, जिससे वायुमंडल का ताप बढ़ रहा है. इसे ही ग्लोबल वार्मिंग कहते है. इसके चलते धरती के तापमान में पहले से ही करीब 1 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो चुकी है. जलवायु परिवर्तन संपूर्ण मानवता के लिए एक बहुत बड़ा खतरा है और पेरिस समझौता इस चुनौती से निबटने के बारे में ही है.      
ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) से मुकाबला करने की दिशा में इस समझौते को बड़ा कदम माना जा रहा है. विकासशील और विकसित देश धरती के बढ़ते तापमान को कम करने के लिए एक साथ खड़े हुए है. फ़िलहाल ग्रीन-हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटोती के मौर्चे पर काम शुरू करने के लिए दुनिया के देश एकजुट दिख रहे है.

पेरिस जलवायु समझौते में तय किये गए लक्ष्य

  • सभी देश कार्बन उत्सर्जन में जल्द-से-जल्द कमी लायेंगे.
  • ग्रीन हाउस गैसों और उनके स्रोत के बीच 2020 तक संतुलन बनाया जायगा.
  • वैश्विक तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस पर सीमित करने की कोशिश का लक्ष्य.
  • हर पांच साल में इस दिशा में हुई प्रगति की समीक्षा की जायगी.
  • 2020 तक कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के लिए विकासशील देशों को हर साल 100 अरब डॉलर की मदद दी  जायगी, जिसे और भी बढाया जा सकता है.


भारत का पक्ष

संयुक्त राष्ट्र में भारत का पक्ष रखते हुए प्रकाश जावडेकर (उस समय पर्यावरण मंत्री) ने कहा  था कि इस समझौते से विकसित और विकासशील देशों की परीक्षा होगी. गैस उत्सर्जन में कटौती और गरीबी उन्मूलन पर भी देशों की गंभीरता की परख होगी. भारत ने यह भी स्पष्ट करते हुए कहा कि धनी देशों के दशकों के औधोगिक विकास के बाद जलवायु परिवर्तन से लड़ने का बौझ गरीब देशों के कंधो पर नही डाला जा सकता. फ़िलहाल भारत ने हर परिवार को बिजली की आपूर्ति की सरकार की योजना के तहत् 2022 तक अपनी नवीकरणीय विधुत क्षमता चार गुना बढ़ाकर 175 मेगावाट करने की घोषणा की है.  
जलवायु परिवर्तन की वजह से पुरे विश्व में समस्याएं बढ़ रही है. भारत में इसका प्रभाव हम सीधे तौर पर देख सकते है. प्रदूषण की समस्या से जलवायु पर बहुत प्रभाव पड़ा है. भारत में पिछले कुछ वर्षों से सूखे की वजह से अधिकाँश किसान बर्बादी के कगार पर खड़े है. और सैकड़ो ने तो आत्महत्या कर अपना जीवन ही समाप्त कर लिया है. देश के कई हिस्सों में सूखे की वजह से पानी की समस्या लगातार बनी हुई है. इसके आलावा कई जगह बेमौसम वर्षा ने बाड़ की समस्या पैदा की है.

भारत द्वारा हर प्रकार से समझौते के अनुसार सहयोग देने का वादा किया जाता रहा है. और आगे भी भारत इसमें अपना सहयोग देने के लिए प्रतिबद्ध है. 

परमाणु अप्रसार संधि

Introduction

परमाणु हथियारों के विस्तार को सामान्यतया विश्व की सुरक्षा के लिए बहुत बड़ा खतरा  माना जाता है. परमाणु प्रौधोगिकी (तकनीक) के उपयोग पर इतनी अधिक चर्चा नही होती है क्योकि किसी भी राष्ट्र के विकास की प्रक्रिया में परमाणु प्रौधोगिकी (तकनीक) के उपयोग को स्वीकार किया गया है. इस प्रोधौगिकी (तकनीक) की शांतिपूर्ण बनाम सैन्य उपयोगो पर वाद विवाद है. पिछले कुछ वर्षो से यह चर्चा अधिक जटिल कार्य है. क्योकि इस प्रौधिगिकी के “दोहरे प्रयोग” को जिस उपयोग के लिए बढाया जा रहा है, उसका अंतिम उपयोग किस प्रकार होगा, इसमें अंतर करना बहुत कठिन हो सकता है. फिर भी अन्तराष्ट्रीय सुरक्षा के विषय में जितना लिखा जा रहा है, उसमे इसी विषय की प्रमुखता है. मुख्य चिंता इनकी बढती हुई संख्या है न कि विस्तार.


परमाणु प्रसार की नीतियों को इस समय दो प्रकार के मुद्दे एक दुसरे को प्रभावित कर रहे है, एक 
तो, तकनीकी और राजनितिक प्रकार के मुद्दे और दुसरे का सम्बन्ध सम्बंधित देशो की क्षमता और उद्देश्य से है.
एक परमाणु संपन्न देश होने से रोकने के लिए उन पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव बनाने की आवश्यकता 
होती है. दूसरा, परमाणु संपन्न होने से रोकने के लिए देशो को आर्थिक या अन्य तरीके के रूप में विभिन्न प्रोत्साहन देने की आवश्यकता होती है.

परमाणु अप्रसार नीति का विकास

1.       युद्धोतर अवस्था वह है जिसमे विश्व में एकमात्र परमाणु शस्त्र शक्ति के रूप में, संयुक्त राज्य अमेरिका का एकाधिकार नियंत्रण बनाये रखने के प्रयासों और गोपनीयता के आधार पर वर्गीकृत किया गया है.

2.       संयुक्त राष्ट्र संघ में 1953 में घोषित “शांति के लिए परमाणु” कार्यक्रम के माध्यम से.

3.       विश्व भर में परमाणु शास्त्रों का प्रसार रोकने के लिए परमाणु शस्त्र सम्पन्न शक्तियों द्वारा सुरक्षा उपायों के माध्यम से नियंत्रण की नीति प्रायोजित की गयी. इसे 1968 में परमाणु अप्रसार संधि (N.P.T.) में और बाद के प्रयासों, जैसे व्यापक परीक्षा प्रतिबंध संधि (C.T.B.T.) में समावेश करने के लिए लाया गया.

4.       इसके बाद भी पश्चमी देशो तथा U.N. द्वारा कई प्रयास किये गये जिसमे कई प्रकार की सन्धिया हुई.


परमाणु अप्रसार संधि का विश्लेषण


परमाणु अप्रसार संधि 1968 में हुई थी. इसका उद्देश्य विश्व भर में परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने के साथ साथ परमाणु परिक्षण पर अंकुश लगाना है. 1 जुलाई 1968 से इस समझौते पर हस्ताक्षर होना शुरू हुआ. अभी इस संधि पर हस्ताक्षर कर चुके देशो की संख्या 190 है.
यह संधि परमाणु सम्पन्न देशो द्वारा सभी देशो के साथ की गयी संधि थी. संधि हस्ताक्षरकर्ताओ को दो श्रेणियों में विभाजित करता है, पहले वे देश जिनके पास परमाणु बम है, (जिनके पास 1 January 1967 से पहले थें) और दुसरे वे देश जिनके पास नही थे. इस प्रकार गैर परमाणु शस्त्र देश परमाणु सामग्री के अपने भंडार का निरिक्षण करने के वचनबद्ध हो गये. N.P.T. उन्हें I.A.E.A. से सुरक्षा उपाए संधियों पर वार्ता करने का वचन देता है. परन्तु ये सुरक्षा उपाए शस्त्र देशो या परमाणु सम्पन्न देशो पर बंधनकारी नही है. जो इसके दोहरे मापदंड को प्रदर्शित करती है. गैर शस्त्र राज्यों द्वारा परमाणु शस्त्र उत्पादन न करने या अर्जित न करने के बदले शस्त्र धारक या परमाणु सम्पन्न देश निम्नलिखित पर सहमत हुए:

1.      परमाणु शस्त्रों या अन्य परमाणु शस्त्र उपकरणों का हस्तांतरण न करना.

2.      1953 में आंशिक परिक्षण प्रतिबन्ध संधि के उपसिद्धात के रूप में सभी (भूमिगत सहित) परमाणु परीक्षणों की समाप्ति की मांग करना

3.      UN के चार्टर के अनुपालन में धमकी या बल प्रयोग को रोकना

4.      अनुसन्धान उत्पादन और शांतिपूर्ण प्रयोजनो के लिए परमाणु ऊर्जा का प्रयोग विकसित करना तथा इस सम्बन्ध में विकासशील देशो की सहायता करना,

5.      परमाणु विस्फोटो के शांतिपूर्ण प्रयोग से संभावित लाभ सभी देशो को उपलब्ध करना

6.      परमाणु शस्त्रों की दोड़ समाप्त करना तथा परमाणु निरस्त्रीकरण अपनाने के लिए संधिवार्ता करना.

     

गैर परमाणु शस्त्र राज्य संधि के आलोचक भी थे. उन्होंने इसे भेदभावपूर्ण संधि महसूस किया. उनकी आलोचना के मुख्य बिंदु थे


1.      संधि के प्रावधानों का असमान स्वरूप, जो सुरक्षा उपाय केवल गैर परमाणु देशो के ऊपर थोपे गये है.

2.      शस्त्र सम्पन्न देशो का शांतिपूर्ण प्रयोग कार्यक्रम का अनुसन्धान करने का अधिकार प्रदान कर उनके वाणिज्यिक हितो को संरक्षण दिया गया है.

3.      शस्त्र सम्पन्न देशो की ओर से अस्पस्ट वचनबद्धता

4.      गैर परमाणु देशो की वैध सुरक्षा चिन्ताओ को करने में विफलता.


परमाणु शस्त्रों का प्रसार रोकने के लिए तैयार किया गया प्रभावकारी अंतर्राष्ट्रीय नियंत्रण व्यवस्था का निर्माण करने का पहला सोपान N.P.T. माना गया है.
सिर्फ भारत, इजराइल, पाकिस्तान और उत्तरी कोरिया इसके सदस्य नही है. N.P.T. के तहत भारत को परमाणु सम्पन्न देश की मान्यता नही दी गयी है. क्योकि भारत को यह संधि भेदभावपूर्ण लगी थी. इसलिए भारत ने अब तक इस पर हस्ताक्षर नही किये है.

Popular Posts