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 यह लेख भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के प्रमुख मौद्रिक नीति साधनों और फरवरी 2025 तक उनकी हालिया समायोजन पर केंद्रित है। यह आरबीआई के मुख्य उद्देश्यों को उजागर करता है, जिनमें तरलता प्रबंधन, मुद्रास्फीति नियंत्रण और आर्थिक विकास को प्रभावित करना शामिल है। इस लेख में विभिन्न नीति दरों (रेपो रेट, रिवर्स रेपो रेट, एमएसएफ, एसडीएफ, बैंक दर) और रिजर्व आवश्यकताओं (सीआरआर, एसएलआर) की भूमिकाओं का विवरण दिया गया है। इसके अलावा, यह इस बात पर भी प्रकाश डालता है कि आरबीआई द्वारा दरों में किए गए बदलाव ग्राहकों तक तुरंत क्यों नहीं पहुंचते और मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए आरबीआई द्वारा अपनाई गई रणनीतियाँ क्या हैं।


यदि आप अंग्रेज़ी में सहज हैं, तो दिए गए लिंक को अवश्य देखें। ChartForest वेबसाइट पर मौद्रिक नीतियों पर विस्तृत रूप से चर्चा की गई है। वहां चार्ट और टेबल भी शामिल किए गए हैं, जिससे आप इसे आसानी से और बेहतर तरीके से समझ पाएंगे।


RBI Monetary Policies Image
RBI Monetary Policies


आरबीआई की मौद्रिक नीति के प्रमुख उद्देश्य


भारतीय रिज़र्व बैंक की मौद्रिक नीति का मुख्य उद्देश्य वित्तीय स्थिरता बनाए रखना और सतत आर्थिक विकास को बढ़ावा देना है। इसके मुख्य लक्ष्य निम्नलिखित हैं:

  • तरलता प्रबंधन (Liquidity Management) – आरबीआई वित्तीय प्रणाली में धन प्रवाह को नियंत्रित करता है ताकि बाजारों का सुचारू रूप से संचालन हो सके।
  • मुद्रास्फीति नियंत्रण (Inflation Control) – आरबीआई का प्राथमिक उद्देश्य मूल्य स्थिरता बनाए रखना और मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना है।
  • आर्थिक विकास (Economic Growth) – मौद्रिक नीति का उपयोग आर्थिक विकास की गति को प्रभावित करने के लिए किया जाता है।

आरबीआई की नीति का मूल उद्देश्य वित्तीय प्रणाली में तरलता प्रबंधन, मुद्रास्फीति नियंत्रण और आर्थिक विकास को प्रभावित करना है।


प्रमुख मौद्रिक नीति दरें और हालिया बदलाव (फरवरी 2025)


आरबीआई विभिन्न प्रकार की नीति दरों का उपयोग उधारी लागत और तरलता को नियंत्रित करने के लिए करता है। फरवरी 2025 में किए गए हालिया संशोधनों का विवरण नीचे दिया गया है:

रेपो रेट (Repo Rate) – 6.50% से घटाकर 6.25% कर दिया गया।

यह वह दर है जिस पर आरबीआई वाणिज्यिक बैंकों को ऋण देता है। इस कटौती का उद्देश्य वैश्विक व्यापार अनिश्चितताओं के बीच आर्थिक विस्तार का समर्थन करना है।

रिवर्स रेपो रेट (Reverse Repo Rate) – 3.35% पर अपरिवर्तित।

यह वह दर है जिस पर आरबीआई बैंकों से धन उधार लेता है। इसे स्थिर रखने का उद्देश्य नियंत्रित तरलता प्रबंधन सुनिश्चित करना है।

मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी (MSF) रेट – 6.75% से घटाकर 6.50% कर दिया गया।

यह बैंकों के लिए आपातकालीन ऋण दर है। इसका उद्देश्य शॉर्ट-टर्म उधारी लागत को कम करना और वित्तीय प्रणाली में पर्याप्त तरलता बनाए रखना है।

स्टैंडिंग डिपॉज़िट फैसिलिटी (SDF) रेट – 6.25% से घटाकर 6.00%

यह वह दर है जिस पर बैंक आरबीआई के पास अतिरिक्त धन जमा कर सकते हैं। इसे घटाने का उद्देश्य बैंकों को अधिक धन आरक्षित करने से हतोत्साहित करना है।

बैंक रेट (Bank Rate) – 6.75% से घटाकर 6.50%

यह वह दर है जिस पर आरबीआई वाणिज्यिक बैंकों को दीर्घकालिक ऋण देता है। इसका उद्देश्य बैंकों की उधारी लागत को कम करना ताकि वे उपभोक्ताओं और व्यवसायों को सस्ती दरों पर ऋण दे सकें है।


आरक्षित आवश्यकताएँ (फरवरी 2025 में अपरिवर्तित)


आरबीआई तरलता प्रबंधन और बैंकिंग प्रणाली की स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए न्यूनतम भंडार आवश्यकताओं को भी नियंत्रित करता है।

कैश रिज़र्व रेशियो (CRR) – 4.00% (अपरिवर्तित)

यह वह न्यूनतम धनराशि है जो बैंकों को आरबीआई के पास जमा करनी होती है। इसे स्थिर रखने का उद्देश्य बैंकिंग प्रणाली की स्थिरता सुनिश्चित करना है।

स्टैच्यूटरी लिक्विडिटी रेशियो (SLR) – 18.00% (अपरिवर्तित)

यह न्यूनतम प्रतिशत है जो बैंकों को अपनी शुद्ध मांग और समय देनदारियों का तरल परिसंपत्तियों में बनाए रखना होता है। इसे अपरिवर्तित रखने का उद्देश्य वित्तीय स्थिरता बनाए रखना और बैंकों को पर्याप्त तरलता प्रदान करना है।


ब्याज दर परिवर्तनों का ग्राहकों तक हस्तांतरण (Transmission Lag)


आरबीआई द्वारा ब्याज दरों में बदलाव तुरंत ग्राहकों तक नहीं पहुंचता। इसके पीछे कई कारण होते हैं:

पर्याप्त मौजूदा तरलता (Sufficient Existing Liquidity)

यदि बैंकों के पास पहले से ही पर्याप्त धनराशि उपलब्ध है, तो वे आरबीआई से ऋण लेने की आवश्यकता महसूस नहीं करते।

निश्चित ब्याज दरें (Fixed Interest Rates on Deposits)

फिक्स्ड डिपॉजिट और छोटी बचत योजनाओं में निश्चित ब्याज दर होती है। इससे बैंकों के लिए तुरंत उधारी दरों में बदलाव करना कठिन हो जाता है।

लाभप्रदता विचार (Profitability Considerations)

बैंक अपने लाभ को बनाए रखना चाहते हैं, इसलिए वे ऋण दरों को तुरंत कम नहीं करते।

बैंक ऋण पर निर्भरता (Reliance on Bank Loans)

भारत में कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट छोटा है, इसलिए व्यवसाय बैंक ऋण पर अधिक निर्भर रहते हैं। इससे बैंकों को ब्याज दरें नियंत्रित करने की अधिक शक्ति मिलती है।


मुद्रास्फीति की समझ और नियंत्रण


आरबीआई दो प्रकार की मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने का प्रयास करता है:

मांग-आधारित मुद्रास्फीति (Demand-Pull Inflation)

अधिक पैसा, कम सामान होने पर होता है। इसे नियंत्रित करने के लिए आरबीआई मनी सप्लाई को कम करता है।

आपूर्ति-पक्षीय मुद्रास्फीति (Supply-Side Inflation)

सामान की कमी (जैसे ईंधन की कीमतों में वृद्धि) के कारण होती है। इस पर आरबीआई सीधा नियंत्रण नहीं रखता, और इसे नियंत्रित करने के लिए सरकार को कदम उठाने की आवश्यकता होती है।


निष्कर्ष

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) मौद्रिक नीति के माध्यम से भारतीय अर्थव्यवस्था को संतुलित करने का प्रयास करता है। फरवरी 2025 में, आरबीआई ने रेपो रेट, एमएसएफ, एसडीएफ और बैंक रेट में कटौती की, जिससे आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने की मंशा साफ होती है। हालांकि, तरलता की मौजूदा स्थिति, निश्चित जमा दरें और बैंकों की लाभप्रदता नीतियाँ दर हस्तांतरण को प्रभावित कर सकती हैं।

मुद्रास्फीति पर नियंत्रण करने के मामले में, आरबीआई मुख्य रूप से मांग-आधारित मुद्रास्फीति को नियंत्रित करता है, जबकि आपूर्ति-संबंधी मुद्रास्फीति के समाधान के लिए सरकारी हस्तक्षेप आवश्यक होता है।


भारत में कॉर्पोरेट गवर्नेंस : विकास, आवश्यकता और चुनौतियाँ

कॉर्पोरेट गवर्नेंस क्या है?-Corporate Governance

साधारण शब्दों में Corporate Governance का संबंध उन तौर तरीकों से है, जिनके माध्यम से Corporate संस्थाएं चलाई जाती है.
Corporate Governance की संरचना कंपनी के बोर्ड (board), प्रबंधको (managers) , शेयरधारको (shareholders) एवं अन्य हितधारकों (stakeholders) सहित कंपनी के विभिन्न हितधारकों के बीच अधिकारो एवं जिम्मेदारियों का बाँटना सुनिश्चित करती है.
Corporate Governance का प्रमुख उद्देश्य संसाधनों का इष्टतम (optimal) उपयोग करने के साथ साथ शेयरधारको (shareholders) की संपत्ति में वृद्धि करना है.



भारत में कॉर्पोरेट गवर्नेंस की आवश्यकता- Need of Corporate Governance 

भारत अभी तक अपनी कानूनी एवं विनियामक प्रणालियों तथा प्रवर्तन क्षमताओं का पूरी तरह से विकास नहीं कर पाया है. निजी क्षेत्र की संस्थाएं विकसित देशों के समान सुविकसित नहीं है.

पारदर्शिता (Transparency) और प्रकटीकारण मानदंडो (Disclosure Norms) की कमी के साथ साथ कंपनी के खातों की गलत जानकारी देने की घटनाएं ऐसे मुद्दे है जिनके जल्दी समाधान किये जाने की आवश्यकता है.

बाजार में कंपनियों की बड़ी संख्या को देखते हुए रिपोर्टिंग और जवाबदेही के मानकों में कमजोरी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है.
इसलिए उपर लिखे इन का कॉर्पोरेट क्षेत्र के कारकों या कमियों की वजह से भारत में कॉर्पोरेट गवर्नेंस की आवश्यकता है.



भारत में कॉर्पोरेट गवर्नेंस का विकास-Development of corporate governance in India 

उदारीकरण (Liberalization) और निजीकरण (Privatization) के बाद भारत में अच्छे Corporate Governance हेतु फ्रेमवर्क (framework) तैयार करने के संबंध में सिफारिश करने के लिए A.S.S.O.C.H.A.M, S.E.B.I और C.I.I ने समितियां गठित की थी.

बाद में कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय ने वैश्विक वित्तीय संकट और भारत में बड़ी कंपनियों के असफल होने के मद्देनजर Corporate Governance स्वैच्छिक दिशानिर्देश 2009 निर्धारित किये थे. इनका उद्देश्य पारदर्शित, नैतिक और उत्तरदायी कॉर्पोरेट गवर्नेंस फ्रेमवर्क का निर्माण करना है.

भारत में कंपनियों के विनियम से सम्बंधित प्रमुख क़ानून कंपनी अधिनियम, 2013 है. इसके अतिरिक्त, S.E.B.I अधिनियम, 1992 द्वारा भी कंपनियां विनियमित होती है.

क्या कहता है कंपनी अधिनियम, 2013

पूर्वर्ती कंपनी अधिनियम, 1956 के स्थान पर यह नया कंपनी अधिनियम लागू किया गया है.
इसमें लेखापरीक्षा समिति का गठन करने का प्रावधान किया गया है, जिसमे कम से कम तीन निदेशक सदस्य शामिल होंगे और उनमे स्वतंत्र निदेशकों का बहुमत होगा.

प्रत्येक निदेशक को अधिनियम में विहित प्रक्रिया के अनुसार किसी कंपनी, कॉर्पोरेट निकाय, फर्म तथा पक्षकारों आदि में अपने हितों का खुलासा करना होता है.

इस अधिनियम के अनुसार कतिपय कंपनियों को कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (C.S.R) समिति का गठन करना होता है. इस समिति को कंपनी की C.S.R पहलों की योजना बनाने, सिफारिश करने और निगरानी करने की जिम्मेदारी सौंपी जाती है.

भारत में कॉर्पोरेट गवर्नेंस की चुनौतियाँ व सुधार-Challenges & Improvements

चुनौतियाँ

प्रमुख शेयरधारक अपने हितों को पूरा करने के लिए कंपनी के संसाधनों पर एकाधिकार प्राप्त कर लेते है. बहुमत रखने वाले शेयरधारको (majority shareholders) और अन्य हितधारको के बीच स्पष्ट एजेंसी गैप दिखाई देता है.
पश्चिमी देशों के विपरीत भारत में बोर्डों और स्वतंत्र निदेशकों को सामान्यत शक्तियां प्रदान नहीं की जाति है और वे शेयरधारको की इच्छानुसार निर्णय लिए जा सके.

सुधार की आवशयकता 

स्टॉक एक्सचेंजों का विकास शेयर के स्वामित्व का पंजीकरण की प्रणाली का विकास करने, अल्पसंख्यक शेयरधारकों के हितों की रक्षा करने के लिए क़ानून बनाने, सतर्कता वित्तीय प्रेस का सशक्तिकरण करने तथा लेखापरीक्षा एवं लेखांकन (Audit and Accounting) मानकों में सुधार करने की आवश्यकता है.

विचारधारा के स्तर पर विभिन्न हितधारकों के मन में रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार के प्रति व्यापक सहनशीलता के खिलाफ स्थाई परिवर्तन लाना होगा.
एशिया-अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर का अर्थ तथा इससे भारत का क्या फायदा होगा?


एशिया-अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर क्या है?

'एशिया-अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर' (Asia Africa Growth Corridor) भारत एवं जापान के बीच आर्थिक सहयोग है. एशिया-अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर का विचार सर्वप्रथम उस समय सामने आया जब नवम्बर 2016 में भारतीय प्रधानमन्त्री एवं जापानी प्रधानमंत्री द्वारा 'संयुक्त घोषणा पत्र' जारी किया गया.
'एशिया-अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर' के सम्बन्ध में आगे की प्रगति 25 मई, 2017 को देखने को मिली जब गुजरात में सम्पन्न अफ्रीकी विकास बैंक की बैठक के दौरान भारत द्वारा एशिया-अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर पर एक विज़न दस्तावेज पेश किया गया.

महारत्न कंपनी: दर्जा प्राप्त करने की शर्ते व कंपनियों की सूची- (Maharatna company: eligibility criteria & companies list)

महारत्न कंपनी का अर्थ

सरकार द्वारा इस टाइटल की स्थापना 2009 में की गयी. जिसका उद्देश्य बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के केंद्रीय उपक्रमों (C.P.S.E) को अपने कारोबार का विस्तार करने तथा विश्व की बड़ी कंपनी के रूप में उभरने में समर्थ बनाना है.
आज के समय में कोई भी महारत्न फर्म या कंपनी किसी प्रोजेक्ट में अपनी कुल कीमत का 15 प्रतिशत निवेश करने का निर्णय बिना सरकार की अनुमति के ले सकती है.
महारत्न का दर्जा ऐसी कंपनियों को दिया जाता है जो न्यूनतम पब्लिक होल्डिंग के साथ स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट हो.


Also read:- भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति और हालिया संशोधन

महारत्न कंपनी का दर्जा प्राप्त करने के जरुरी शर्ते- (Eligibility Criteria for Grant of Maharatna)


  • 'नवरत्न' का दर्ज़ा प्राप्त होना चाहिए.
  • S.E.B.I के नियामकों के तहत न्यूनतम निर्धारित सार्वजनिक हिस्सेदारी के साथ भारतीय शेयर बाजार में सूचीबद्ध होना चाहिए.
  • पिछले तीन सालों के दौरान औसत सालाना शुद्ध संपत्ति 15,000रु करोड़ से ज्यादा होनी चाहिए.
  • पिछले तीनस सालो के दौरान औसत सालाना कारोबार 25,000रु करोड़ से ज्यादा होना चाहिए.
  • कर आदायगी के बाद पिछले तीन सालो के दौरान औसत सालाना शुद्ध लाभ 5,000रु  करोड़ से ज्यादा होना चाहिए.
  • वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण उपस्थिति/ अंतर्राष्ट्रीय ऑपरेशन्स होने चाहिए अर्थात् देश के आलावा कंपनी का कारोबार विदेश में भी होना चाहिए.
  • 'महारत्न' का दर्जा प्रदान करने की प्रक्रिया और साथ उनकी समीक्षा 'नवरत्न' का दर्जा प्रदान के लिए प्रचलित प्रक्रिया के सामान ही है.

भारत की प्रमुख महारत्न कंपनियां- (List of Maharatna Companies)

भारत की 8 प्रमुख महारत्न कंपनियां इस प्रकार है (2017 तक)-
  1. Bharat Heavy Electricals Limited
  2. Coal India Limited
  3. GAIL (India) Limited
  4. Indian Oil Corporation Limited
  5. NTPC Limited
  6. Oil & Natural Gas Corporation Limited
  7. Steel Authority of India Limited
  8. Bharat Petroleum Corporation Limited 
पेट्रोलियम क्षेत्र  की कंपनी भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (B.P.C.L) को 'महारत्न'  का दर्जा सरकार ने सितम्बर 2017 में प्रदान किया है. सार्वजनिक क्षेत्र की यह कंपनी पहले 'नवरत्न' कंपनी थी. महारत्न का दर्जा प्राप्त होने से इसे अब अधिक वित्तीय एवं परिचालन स्वायत्तता प्राप्त होगी तथा 5,000 रु करोड़ तक के निवेश के फैसले यह स्वयं अपने ही स्तर तक कर सकेगी. नवरत्न कंपनियों के लिए यह सीमा 1,000 रु करोड़ की है. B.P.C.L को महारत्न का दर्जा प्राप्त हो जाने से देश में महारत्न कंपनियों की कुल संख्या अब 8 हो गयी है. वहीँ अब नवरत्न कंपनियों की संख्या 16 हो गयी है. 

नवरत्न कंपनी: दर्जा प्राप्त करने की शर्ते व कंपनियों की सूची- (Navratna company: eligibility criteria & companies list)

नवरत्न कंपनी का अर्थ

नवरत्न को मूल रूप से 1997 में सरकार द्वारा लाया गया था. इसमें उन सार्वजनिक कंपनियों को शामिल किया गया जिनमे वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा (competition) करने की क्षमता है. नवरत्न कंपनी का दर्जा देकर इन्हें अधिक स्वायत्तता प्रदान की गयी ताकि बाजार में देश की कम्पनियों को वैश्विक दर्जा प्राप्त हो सके. वर्तमान में 16 कंपनियां (2017 तक) को नवरत्न का  दर्जा प्राप्त है.

नवरत्न कंपनी का दर्जा प्राप्त करने के लिए जरुरी शर्ते- (Eligibility Criteria for Grant of Navratna)

  • किसी कंपनी को नवरत्न का दर्जा प्राप्त करने के लिए उसे पहले मिनीरत्न का दर्जा प्राप्त होना चाहिए. 
  • इसके निदेशक मंडल के चार स्वतंत्र निदेशक होना आवश्यक है. इनके अतिरिक्त 6 विभिन्न मानकों- Networth, Net Profit, Total Manpower Cast, Total Cost of Production, Cast of Services, P.B.D.I.T (Profit Before Depreciation, Interest, and Taxes) व Capital Employed आदि में न्यूनतम 60 स्कोर (100 में से) इसे प्राप्त होना आवश्यक है.

    भारत की प्रमुख नवरत्न कंपनियां- (List of Navratna Companies)

    भारत की 16 प्रमुख नवरत्न कंपनियों की सूची इस प्रकार है (2017 तक)-
    1. ग्रामीण विद्धुतिकरण निगम लिमिटेड (R.E.C)
    2. हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (H.P.C.L)
    3. नेशनल एल्युमीनियम कंपनी (N.A.L.C.O)
    4. महानगर टेलीफ़ोन निगम लिमिटेड (M.T.N.L)
    5. पॉवर फाइनेंस कॉर्पोरेशन (P.F.C)
    6. भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (B.E.L)
    7. भारतीय नौवहन निगम (S.C.I)
    8. हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (H.A.L)
    9. ऑइल इंडिया लिमिटेड (O.I.L)
    10. पॉवर ग्रिड कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड (P.G.C.I.L)
    11. राष्ट्रीय इस्पात निगम लिमिटेड (R.I.N.L)
    12. राष्ट्रीय खनिज विकास निगम (N.M.D.C)
    13. नवेली लिग्नाइट लिमिटेड (N.L.L)
    14. नेशनल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन लिमिटेड (N.B.C.C.L)
    15. इंजीनियरिंग इंडिया लिमिटेड (E.I.L)
    16. कंटेनर कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया (C.O.N.C.O.R).

    मिनीरत्न कंपनी: दर्जा प्राप्त करने की शर्ते व कंपनियों की सूची- (Miniratna company: eligibility criteria & companies list)

    मिनीरत्न कंपनी का अर्थ

    मिनीरत्न की अवधारणा 2002 में शुरू की गयी थी और यह 41 सार्वजनिक कंपनियों को दिया गया था. मिनीरत्न कंपनियों को के साथ संयुक्त उद्यमों में प्रवेश करने की अनुमति है, और वे विदेशी कार्यलय भी खोल सकते है, परन्तु कुछ सीमाओं के अन्दर.
    मिनीरत्न कंपनियों को दो वर्गों में बाटा गया है- वर्ग-1 व वर्ग-2.

    मिनीरत्न वर्ग- 1 

    मिनीरत्न कंपनी वर्ग 1  बनने के लिए कंपनी के पास पिछले तीन वर्षों से निरंतरता लाभ कमाया होना चाहिये तथा तीन साल में एक बार 30 करोड़ का शुद्ध लाभ अर्जित किया जाना चाहिए 

    मिनीरत्न वर्ग-1 में शामिल कंपनियां

    1. Airports Authority of India
    2. Antrix Corporation Limited
    3. Balmer Lawrie & Co. Limited
    4. Bharat Coking Coal Limited
    5. Bharat Dynamics Limited
    6. BEML Limited
    7. Bharat Sanchar Nigam Limited
    8. Bridge & Roof Company (India) Limited
    9. Central Warehousing Corporation
    10. Central Coalfields Limited
    11. Chennai Petroleum Corporation Limited
    12. Cochin Shipyard Limited
    13. Dredging Corporation of India Limited
    14. Kamarajar Port Limited
    15. Garden Reach Shipbuilders & Engineers Limited
    16. Goa Shipyard Limited
    17. Hindustan Copper Limited
    18. HLL Lifecare Limited
    19. Hindustan Newsprint Limited
    20. Hindustan Paper Corporation Limited
    21. Housing & Urban Development Corporation Limited
    22. India Tourism Development Corporation Limited
    23. Indian Rare Earths Limited
    24. Indian Railway Catering & Tourism Corporation Limited
    25. Indian Renewable Energy Development Agency Limited
    26. India Trade Promotion Organisation
    27. IRCON International Limited
    28. KIOCL Limited
    29. Mazagaon Dock Limited
    30. Mahanadi Coalfields Limited
    31. Manganese Ore (India) Limited
    32. Mangalore Refinery & Petrochemical Limited
    33. Mishra Dhatu Nigam Limited
    34. MMTC Limited
    35. MSTC Limited
    36. National Fertilizers Limited
    37. National Seeds Corporation Limited
    38. NHPC Limited
    39. Northern Coalfields Limited
    40. North Eastern Electric Power Corporation Limited
    41. Numaligarh Refinery Limited
    42. ONGC Videsh Limited
    43. Pawan Hans Helicopters Limited
    44. Projects & Development India Limited
    45. Railtel Corporation of India Limited
    46. Rail Vikas Nigam Limited
    47. Rashtriya Chemicals & Fertilizers Limited
    48. RITES Limited
    49. SJVN Limited
    50. Security Printing and Minting Corporation of India Limited
    51. South Eastern Coalfields Limited
    52. State Trading Corporation of India Limited
    53. Telecommunications Consultants India Limited
    54. THDC India Limited
    55. Western Coalfields Limited
    56. WAPCOS Limited
    57. Ed.CIL (India) Limited
    58. HSCC (India) Limited
    59. National Small Industries Corporation Limited 

    मिनीरत्न वर्ग- 2

    कंपनी द्वारा पिछले तीन साल से लगातार लाभ कमाया हो और उसकी नेट वर्थ सकारात्मक होनी चाहिए.

    मिनीरत्न वर्ग-2 में शामिल कंपनियां

      1. Bharat Pumps & Compressors Limited
      2. Broadcast Engineering Consultants (I) Limited
      3. Central Mine Planning & Design Institute Limited
      4. Central Railside Warehouse Company Limited
      5. Engineering Projects (India) Limited
      6. FCI Aravali Gypsum & Minerals India Limited
      7. Ferro Scrap Nigam Limited
      8. HMT (International) Limited
      9. Indian Medicines & Pharmaceuticals Corporation Limited
      10. M E C O N Limited
      11. Mineral Exploration Corporation Limited
      12. National Film Development Corporation Limited
      13. P E C Limited
      14. Rajasthan Electronics & Instruments Limited
      15. Artificial Limbs Manufacturing Corporation of India 


      Forensic Audit क्या है?

      • एक फॉरेंसिक ऑडिट किसी फर्म या व्यक्तिगत वित्तीय जानकारी का एक ऐसा मूल्यांकन है जिसका प्रयोग अदालत में साक्ष्य के रूप में किया जाता है. 
      • धोकाधड़ी, गड़बड़ी या अन्य वित्तीय दावों के लिए पार्टी पर मुकदमा चलाने के लिए एक फॉरेंसिक ऑडिट आयोजित किया जा सकता है. 
      • फॉरेंसिक ऑडिट, जांच प्रक्रिया का ही एक हिस्सा है जिसमे कंपनी के वित्तीय विवरण की जांच के दौरान अपनाये जाने वाले तौर-तरीको का ही इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन फॉरेंसिक ऑडिट में किसी कंपनी के वित्तीय विवरण की जांच या मूल्यांकन के लिए एक निश्चित अवधि के दौरान हुए सभी लेन-देनों की जानकारी जुटाई जाती है.

      Bitcoin: का अर्थ व इससे जुड़े तथ्य (meaning and facts)

      कहने को तो यह भी एक मुद्रा या करेंसी है। ठीक उसी तरह जैसे, भारत का रुपया है या अमेरिका का डॉलर है, लेकिन इसमें दो-तीन फर्क है। एक तो यह कि ज्यादातर मुद्राओं पर सरकार और उनके बैंकों का नियंत्रण होता है। इस प्रकार दुनिया की सारी मुद्राएँ नियम-कानूनों से बंधी है और लोगो को उनके जरिये लेन-देन करते वक़्त कानूनों व शर्तों का पालन करना पड़ता है। ऐसे में बिटकॉइन के रूप में एक ऐसी मुद्रा के बारे में सोचा गया, जो किसी भी सरकार और bank के नियंत्रण से बाहर हो और उस पर सरकारी नियम-कानूनों की बंदिश न हो। वर्ष 2009 में डिजिटल यानी वर्चुअल करेंसी के रूप में Bitcoin अस्तित्व में आया। बताया गया कि इसे सातोशी नकामोतो नामक व्यक्ति ने बनाया है। परन्तु आज तक इसको बनाने वाला सामने नही आया

      दूसरी मुद्राओं की तुलना में Bitcoin से जुड़ा अंतर यह है कि यह करेंसी नोट या सिक्कों में न होकर एक प्रकार के कंप्यूटर कोड (computer code) के रूप में है। इन्हीं कोड को कंप्यूटर-इन्टरनेट की सहायता से खरीदा-बेचा जाता है। इनकी खरीद करने के बाद इन्हें ऑनलाइन वॉलेट में रखा जाता है। चूँकि ये कंप्यूटर पर बनाई और न दिखने वाली करेंसी है, इसलिए इन्हें क्रिप्टो-करेंसी भी कहा जाता है। अन्य मुद्राओं की अपेक्षा Bitcoin में अंतर और भी है। अन्य सभी करेंसियों पर चूँकि सरकार और bank का नियंत्रण होता है, इसलिए मुद्रास्फीति आदि कारकों के आधार पर देशों में जरुरत  के अनुसार जितने चाहे सिक्कों की ढलाई और नोटों की छपाई कर ली जाती है, लेकिन Bitcoin की संख्या तय है। इसके आविष्कारकर्ता ने जो मॉडल बनाया है, उसमे फ़िलहाल पूरी दुनिया में सिर्फ 2.1 करोड़ Bitcoin बनाने की व्यवस्था है। इनमे से 1.5 करोड़ Bitcoin फ़िलहाल प्रचलन में है। यह भी उल्लखेनीय है कि मौजूदा व्यवस्था मे हर 10 मिनट पर नये Bitcoin बनाने की छुट है, परन्तु संख्या हर हाल में 2.1 करोड़ ही रहेगी, उससे ज्यादा नही होगी, जब तक कि इसका मॉडल बदल नही दिया जाता। 

      Bitcoin: सृजन और विस्तार (creation)

      इसकी कीमत को देखकर आज दुनिया में हर व्यक्ति Bitcoin हासिल करना चाहता है. यह काम तीन तरीको से हो सकता है-
      1. Internet पर मौजूद Exchange Websites प्रचलित प्रमुख करेंसियों के बदले में Bitcoin उपलब्ध कराती है. इसी तरह कुछ Apps भी अपनी फीस लेकर Bitcoin बेचते है।
      2. एक अन्य तरीका है कि वस्तुओं या सेवाओं को बेचने के बदले उनका भुगतान Bitcoin से माँगा जाए।हैकर तो फिरौती की रकम ही Bitcoin में मांग रहे है। 
      3. तीसरा तरीका है Bitcoin की माइनिंग (mining)। माइनिंग से इसे हासिल करना एक कला है। Bitcoin चूँकि कंप्यूटर के माध्यम से बनाई यानी create की जाने वाली क्रिप्टो करेंसी है। इसलिए इसे बनाना काफी मुश्किल है। इसे बनाने की कुछ कुछ शर्ते है, जिनका पालन करना जरुरी है। इसके लिए सबसे पहले कंप्यूटर सिस्टम पर Bitcoin से जुड़ा Community Software Install करना होता है। Bitcoin हासिल करने की पूरी प्रक्रिया माइनिंग कहलाती है। Bitcoin की माइनिंग का काम शुरू होता है Bitcoin से जुड़े Community Software को Computer System पर install करने से। Software Download करने पर एक विशेष code generate होता है। यह खास code Bitcoin Address कहा जाता है। रकम का लेन-देन यानी Transaction  में यह code bank account की तरह काम करता है। कोड के जरिये व्यक्ति की पहुँच bitcoin के सार्वजनिक बहीखाते (लेजर) तक हो जाती है। जंहा उसे bitcoin के पुराने transaction (जिन्हें ब्लॉक कहा जाता है) की खोज करनी होती है। इसके Online बहीखाते में पुराने ब्लॉक्स की खोज करना और उसमे नए transaction दर्ज करवाना मुख्य रूप से यही दो काम bitcoin माइनिंग के तहत होते है. लेन-देन के पुराने विवरण में नए transaction दर्ज करवाना bitcoin माइनिंग है। इसके Online बहीखाते में जब नए transaction दर्ज होते है, तो पुराने transaction को मिलाकर एक ब्लॉकचेन बनती है। ब्लॉकचेन से ही यह तय होता है कि कोई लेन-देन हुआ है। माइनिंग की इस प्रक्रिया का असल मकसद यह सुनिश्चित करना होता है। कि यह काम पूरी तरह सुरक्षित ढंग से हो और इसमें किस तरह के फर्जीवाड़े की गुंजाइश न रहे। माइनिंग करने वाले लोग माइनर कहलाते है। और माइनिंग करने के एवज में उन्हें फीस व नए bitcoin भी मिलते है। ध्यान रहे कि bitcoin माइनिंग का काम bank की पासबुक Update कराने जितना आसान नही होता। इस process को बेहद जटिल बनाया गया है। माइनिंग में सिर्फ हालिया transaction को ब्लॉक में जोड़कर bitcoin नही मिल जाते, बल्कि इसके लिए जटिल गणितीय पहेली भी हल करनी होती है। पहेली हल करने के बाद ही माइनर ब्लॉकचेन में नया ब्लॉक जोड़ने योग्य हो पाते है और इसके लिए वे Reward माइनर को transaction फीस और नए bitcoin हासिल करने का दावेदार ठहराते है। जब कोई माइनर एक ब्लॉक की खोज कर लेता है, तो उसे Reward के रूप में bitcoin की निश्चित संख्या मिलती है। bitcoin के माइनर यानी खनिक ही उसे बनाकर या हासिल करके दुसरे लोगो के बेचते है और इसके बदले फीस के रूप में रकम लेते है। 

      Bitcoin की सुरक्षा (security)

      Computer पर bitcoin हासिल करने पर इसका software download करना होता है, जिसकी प्रक्रिया शुरू करने पर एक ख़ास कोड मिलता है। इसे bitcoin address कहा जाता है। धनराशी के लेन-देन यानी transaction में यह कोड ही सबसे प्रमुख होता है, क्योंकि यही bank account की तरह काम करता है। bitcoin से किसी भी खरीदारी या लेन-देन के लिए यह कोड जरुरी है यदि आपको किसी को रकम भेजनी है, तो उसका bitcoin address आपके पास होना चाहिए। यदि आपको रकम हासिल करनी है, तो आपको अपना address उसे भेजना होगा। mobile phone पर मौजूद software या computer पर install किये गये प्रोग्राम से इस कोड के जरिये धनराशी भेजी जा सकती है। एक बार bitcoin generate होने के बाद इस code को user अपनी hard drive या pen drive में save कर सकता है। या अपनी virtual wallet में रख सकता है. कोड सुरक्षित होते है, लेकिन Digital Wallet नही। इसलिए इसे सुरक्षित रखने के लिए password का इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा, कागज पर कोड को प्रिंट करके सुरक्षित रखा जा सकता है। 

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      Bitcoin के लाभ व हानियाँ (advantages & disadvantages)

      Bitcoin के लाभ


      1. इस virtual currency के बेशुमार फायदे है, जैसे- इसे email भेजने की तरह दुनिया में कभी भी, कही भी, किसी को भी transfer किया जा सकता है, कोई  सरकार या bank इस currency पर सेंसरशिप नही लगा सकता है।
      2. इसके system को हैकिंग-प्रूफ  मन जाता है। फर्जी currency बनाना भी नामुमकिन है। क्योकि मैथमेटिकल कोड पर आधारित सिस्टम में फर्जी कोड generate नही हो सकता। 
      3. अगर कोई चाहता है कि पैसे transfer करने में न तो कोई bank या व्यक्ति आये और न ही transaction फीस ले, तो यह सिर्फ bitcoin में ही संभव है। 
      4. bitcoin में दशमलव के आठवें अंक तक छोटी रकम भेजी जा सकती है। जैसे 0.00000001 बीटीसी भी किसी को transfer किये जा सकते है। 

      Bitcoin की हानियां  

      1. इसके जरिये होने वाली खरीदारी पूरी तरह गोपनीय होती है, सरकारी एजेंसिया इसके लेन-देन का पता नही लगा सकती, इसलिए इसका फायदा अपराधी उठाते है। 
      2. सरकारें इस पर टैक्स नही ले सकती, इस वजह से bank और सरकारें इसे वैधता नही देती है। 
      3. bitcoin को ज्यादातर देश इसलिए मान्यता नही दे रहे है, क्योकि इसके जरिये होने वाले खरीद-फरोख्त और इसके धारको का पता लगाना मुश्किल है। असल में money laundering यानी काले धन को सफ़ेद को में बदलने की प्रक्रिया में bitcoin काफी मददगार साबित हो रहे है। इस वजह से हवाला, टैक्स चोरी, ड्रग्स की खरीद-फरोख्त, हैकिंग और आतंकी गतिविधि में bitcoin के बढ़ते इस्तेमाल से सरकारे व एजेंसिया परेशान है।
      bitcoin के पक्ष में तथा विपक्ष में कई विचार दिए जा चुके है परन्तु आज इसकी value तेजी से बढ़ रही है। और जापान जैसे देश ने इसे मान्यता भी दे दी है। bitcoin की तरह कई देश अपने यहाँ virtual currency की शुरुआत कर चुके है। परन्तु bitcoin की value इन सभी से ज्यादा है। 

      Important Financial Terminologies (आर्थिक शब्दावलियाँ)



      Repo Rate (रेपो दर):-  अल्पकालिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु जिस ब्याज दर पर वाणिज्यिक बैंक (commercial bank) रिज़र्व बैंक (Reserve Bank) से नकदी ऋण प्राप्त करते है, ‘रेपो दर’ कहलाता है.

      Bank Rate (बैंक दर):-  जिस सामान्य ब्याज दर पर Reserve Bank द्वारा commercial bank को पैसा उधार दिया जाता है, बैंक दर कहलाता है. इसके माध्यम से Reserve Bank द्वारा साख नियंत्रण/क्रेडिट conrtol किया जाता है.

      Reverse Repo Rate (रिवर्स रेपो दर):-  बैंकों द्वारा अपनी अतिरिक्त राशि को Reserve Bank में जमा करने पर रिवर्स रेपो दर से ब्याज मिलता है.

      Cash Reserve Ratio (नकद आरक्षित अनुपात):-  C.R.R (Cash Reserve Ratio) किसी Commercial Bank में कुल जमा राशि का वह भाग है जिसे Reserve Bank के पास अनिवार्य रूप से जमा करना पड़ता है. इसकी दर जितनी ऊँची होती है बैंकों की साख सृजन क्षमता उतनी ही कम होती है.

      G.S.T (वस्तु एवं सेवा कर)

      •  GST एक अप्रत्यक्ष कर है, जो देशभर में वस्तुवो और सेवाओं की आपूर्ति पर विनिर्माता से उपभोगताओं तक एकल कर होगा जिससे पूरा देश एक एकीकृत साझा व्यापर में परिवर्तित हो सकेगा.
      • उत्पादन के प्रत्येक चरण में भुगतान किये गए इनपुट करों का लाभ मूल्य संवर्द्धन के बाद के चरण में उपलब्ध होगा. इस प्रकार उत्पादन के प्रत्येक स्तर पर केवल “वैल्यू एडिसन” पर ही यह कर देना होगा.
      • GST के लागू होने से केंद्रीय करों में से केंद्रीय उत्पाद शुल्क, अतिरिक्त उत्पाद शुल्क, सेवा कर, एडिशनल कस्टम ड्यूटी, विशेष और अतिरिक्त कस्टम ड्यूटी तथा वस्तुओं व सेवाओं पर लगने वाले सारे सरचार्ज व सैस जहा समाप्त हो चुके है, वही राज्यों, के करों में VAT, मनोरंजन कर, बिक्री कर, खरीद कर, विलासिता कर, लोटर, सट्टे व जुए पर लगने वाले का तथा सरचार्ज व सेस इसमें समाहित हो गए है. इस प्रकार केंद्र, राज्यों व स्थानीय निकायों द्वारा लिए जाने वाले विभिन्न अप्रत्यक्ष करों के स्थान पर एकीकृत GST ही वसूला जा रहा है.
      • कुछ समय बाद वस्तुओ के मूल्य इससे कम होंगे, जिसका सीधा लाभ उपभोगताओं को होगा. सेवाओं के मूल्यों में कुछ वृद्धि इससे होगी.
      • वस्तुओं व सेवाओं की लागत कम होने से भारत के निर्यात को भी बढ़ावा मिलेगा.
      • GST की संरचना दोहरी किस्म की है. केंद्र सरकार द्वारा लगाया व वसूला जाने वाला कर CGST तथा राज्यों की सरकारों लगाया व वसूला जाने वाला कर SGST कहा जायगा.
      • GST के प्रत्येक निर्णय के लिए एक GST परिषद् (GST council) का गठन किया गया है. इस GST परिषद् में केंद्र व राज्य दोनों का प्रतिनिधित्व की व्यवस्था की गयी है. इसका अध्यक्ष केंद्रीय वित्त मंत्री होंगे.
      • केंद्र व राज्य सरकारों दोनों को ही GST के सम्बन्ध में कानून बनाने का अधिकार होगा. 
      • GST के परिणामस्वरूप अगर राज्यों को हानि होती है, तो इसकी भरपाई केंद्र 5 वर्षों तक राज्यों को करेगा.




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