राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत  (भाग-4, अनुच्छेद 36 से 51 तक)

नीति निर्देशक सिद्धांत का अर्थ

किसी भी राष्ट्र के निर्माण में नीति निदेशक सिद्धांतों को बहुत महत्वपूर्ण समझा जाता है। नीति निदेशक तत्व राज्य के लोकतान्त्रिक एवं संवैधानिक ढाँचे के विकास एवं इनको नियोजित रूप से बनाए रखने के लिए जरुरी है। नीति निदेशक तत्वों को आयरलैंड के संविधान से लिया गया है। नीति निदेशक तत्व कार्यपालिका एवं विधायिका के वे तत्व है जिनके अनुसार इन्हें अपना कार्यो को सहज ढंग से करना होता है। राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों को संविधान के भाग 4, अनुच्छेद 36 से 51 तक शामिल किया गया है। संक्षित में, नीति निदेशक तत्व का उद्देश्य भारत को एक लोकतान्त्रिक एवं लोक कल्याणकारी राज्य बनाना है।

ये तत्व किस न्यायलय द्वारा लागु नही करवाए जा सकते है। इन तत्वों का स्वरुप वैधानिक न होकर राजनीतिक है। इन तत्वों के द्वारा ही राज्य को अपने अधिकारों का उपयोग करना होता है। ये तत्व शासन व्यवस्था के मूल आधार के रूप समझे जाते है।

नीति निदेशक तत्वों का विश्लेषण


नीति निदेशक सिद्धांत राष्ट्र के प्रशासकों के लिए एक आचार संहिता है इसे न्यायालय द्वारा लागु नही किया जा सकता अर्थात् इसे वैधानिक शक्ति प्राप्त नही है राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत या तत्व निम्नलिखित है-
  • अनुच्छेद 36: परिभाषा
  • अनुच्छेद 37: इस भाग में शामिल तत्वों को लागू करना
  • अनुच्छेद 38: राज्य लोक कल्याण की अभिवृद्धि के लिए सामाजिक व्यवस्था बनाएगा
  • अनुच्छेद 39: नीति तैयार करने के दौरान राज्य आजीविका के पर्याप्त साधन, समान कार्य के लिए समान वेतन, संसाधन वितरण, नागरिकों की सुरक्षा और बच्चों के स्वस्थ विकास प्रदान करने का प्रयास करेगा
  • अनुच्छेद 40: ग्राम पंचायतों का गठन  करना
  • अनुच्छेद 41: राज्य (आर्थिक क्षमता और विकास की अपनी सीमाओं के भीतर) काम, शिक्षा आदि के अधिकार के लिए प्रभावी और बेरोजगारी, बुढ़ापे, बीमारी, विकलांगता या अन्य किसी भी मामले  में सार्वजनिक सहायता के लिए प्रभावी प्रावधान करेगा
  • अनुच्छेद 42: काम की न्याय संगत और मानवोचित दशाओं तथा प्रसूति सहायता का उपबंध
  • अनुच्छेद 43: कर्मकारों के लिए निर्वाहन मजदूरी एवं कुटीर उद्दोग को प्रोत्साहन
  • अनुच्छेद 44: नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता
  • अनुच्छेद 45: बालकों के लिए नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा का उपबंध
  • अनुच्छेद 46: राज्य की अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य दुर्बल वर्गों की शिक्षा और अर्थ संबंधी हितो की अभिवृद्धि
  • अनुच्छेद 47: पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊंचा करने तथा लोक स्वास्थ्य का सुधार करने का राज्य कर्तव्य
  • अनुच्छेद 48: कृषि और पर्यावरण का संघटन
  • अनुच्छेद 48 (क): पर्यावरण का संरक्षण तथा संवर्धन और वन्य जीवों की रक्षा का प्रयास करेगा
  • अनुच्छेद 49: राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों, स्थानों और वस्तुओ का संरक्षण
  • अनुच्छेद 50: कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण
  • अनुच्छेद 51: अंतर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा को बढावा देना।

नीति निदेशक तत्वों का महत्व

  • राज्य द्वारा सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय को बढ़ावा देने के लिए
  • लोगो के विकास के लिए राज्य को कल्याणकारी की भूमिका के निर्वहन के लिए निर्देशित करना 
  • नागरिकों के लिए आजीविका के पर्याप्त साधन सुरक्षित करने के लिए
  • पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए समान कार्य अवसर प्रदान करना
  • समाज के गरीब तबके के लिए ज्यादा संसाधन जुटाना
  • श्रमिकों के बाल शोषण और शोषण की रोकथाम करना 
  • राज्य को भारत के सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता की ओर प्रयास करना 
  • बच्चों के लिए नि: शुल्क और अनिवार्य शिक्षा
  • अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा का रखरखाव, राष्ट्रों के बीच न्याय और संबंधो को बढ़ाना, अंतर्राष्ट्रीय कानून के प्रति सम्मान करना तथा अंतर्राष्ट्रीय विवादों का शांतिपूर्ण तरीके से निपटारा करना। 

मौलिक अधिकार (भाग - 3, अनुच्छेद 12 से 35 तक)

  • भारतीय संविधान के भाग 3 के अंतर्गत अनुच्छेद 12 से 35 तक मौलिक अधिकारों का उल्लेख है.
  • जब संविधान का संपादन किया गया, उस समय मूल अधिकारों की संख्या 7 थी. लेकिन 44वें  संविधान संशोधन, 1976 के द्वारा संपत्ति के मौलिक अधिकार को समाप्त करके इस अधिकार को विधिक अधिकार (कानूनी अधिकार) बना दिया गया. इस प्रकार अब सिर्फ छ: मौलिक अधिकार ही है.
  • भारतीय संविधान द्वारा नागरिकों को निम्नलिखित छ: प्रकार के मौलिक अधिकार प्राप्त है:-

Right to equality (समता का अधिकार)


    • अनुच्छेद 14: विधि के समक्ष समता का अधिकार
    • अनुच्छेद 15: धर्म, नस्ल,जाति, लिंग, या जन्म-स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध
    • अनुच्छेद 16: लोक नियोजन के विषय में अवसर की समानता
    • अनुच्छेद 17: अस्पृश्यता (छुआछूत) का अंत
    • अनुच्छेद 18: उपाधियों का अंत

Right to freedom (स्वतंत्रता का अधिकार)

    • अनुच्छेद 19: संविधान के अनुच्छेद 19 में छ: प्रकार की स्वतंत्रता का अधिकार है:-
      • बोलने  की स्वतंत्रता,
      • शांतिपूर्ण बिना हथियारों के एकत्रित होने और सभा करने की स्वतंत्रता,
      • संघ बनाने की स्वतंत्रता,
      • देश के किसी भी क्षेत्र में आवागमन की स्वतंत्रता,
      • देश के किसी भी क्षेत्र में निवास करने और बसने की स्वतंत्रता,
      • संपत्ति का अधिकार
    • अनुच्छेद 20: अपराधों के लिए दोष-सिद्धि के सम्बन्ध में संरक्षण
    • अनुच्छेद 21: प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण
      • अनुच्छेद 21 (क): राज्य 6 से 14 वर्ष की आयु के समस्त बच्चों को इस ढंग से राज्य विधि द्वारा अवधारित करें कि वह सभी बच्चों को  नि:शुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध करायगा. (86वां संशोधन - 2002 के द्वारा).
    • अनुच्छेद 22: कुछ दशाओं में गिरफ़्तारी और निरोध में संरक्षण

Right against exploitation (शोषण के विरुद्ध अधिकार)

    • अनुच्छेद 23: मानव के व्यापर अर्थात् मानव तस्करी और बालक श्रम का प्रतिषेध या रोक
    • अनुच्छेद 24: बालकों के नियोजन का प्रतिषेध

Right to freedom of religion (धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार)

    • अनुच्छेद 25: अंत:करण की और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता 
    • अनुच्छेद 26: धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता 
    • अनुच्छेद 27: राज्य किसी भी व्यक्ति को ऐसे कर देने के लिए बाध्य नही कर सकता है, जिसकी आय किसी विशेष धर्म अथवा धार्मिक संप्रदाय की उन्नति या पोषण में व्यय करने के लिए विशेष रूप से निश्चित कर दी गयी है.
    • अनुच्छेद 28: राज्य-विधि से पूर्णत: पोषित किसी शिक्षा संस्था में कोई धार्मिक शिक्षा नही दी जायगी

Cultural and Educational rights (संस्कृति एवं शिक्षा सम्बन्धी अधिकार) 

    • अनुच्छेद 29: अल्पसंख्यक वर्गों के हितो का संरक्षण
    • अनुच्छेद' 30: शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन करने का अल्पसंख्यक वर्गों का अधिकार

Right to constitutional remedies (संवैधानिक उपचारों का अधिकार)

    •  अनुच्छेद 32: इसके अंतर्गत मौलिक अधिकारों को प्रवर्तित कराने के लिए समुचित कार्रवाईयों द्वारा उच्चतम न्यायालय में आवेदन करने का अधिकार प्रदान किया गया है. इस सन्दर्भ में सर्वोच्च न्यायालय को पांच तरह के रिट (writ) जारी करने की शक्ति प्रदान की गयी है. ये writ निम्नलिखित है-
      • बंदी प्रत्यक्षीकरण
      • परमादेश
      • प्रतिषेध-लेख
      • उत्प्रेषण
      • अधिकार पृच्छा-लेख.






    भारतीय संविधान का संक्षिप्त विवरण 

    • भारत का संविधान भारत का सर्वोच्च कानून है.
    • संविधान का निर्माण भारतीय जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों की संविधान सभा द्वारा किया गया.
    • संविधान सभा का प्रथम अधिवेशन 9 दिसम्बर, 1946 को दिल्ली में हुआ जिसकी अध्यक्षता डॉ. सच्चीदानंद सिन्हा ने की थी.
    • संविधान के निर्माण के लिए कई समितियां बनायीं गयी.
    • 11 दिसम्बर, 1946 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद को संविधान सभा का स्थायी अध्यक्ष नियुक्त किया गया.
    • डॉ. भीमराव अम्बेडकर की अध्यक्षता में सात सदस्यों वाली प्रारूप समिति ने संविधान का अंतिम रूप से निर्माण किया.
    • संविधान को तैयार करने में 2 साल 11 महीने और 18 दिन लगे थे. 
    • 26 नवम्बर, 1949 को संविधान अंगीकृत किया गया तथा 26 जनवरी, 1950 से इसे संपूर्ण भारत में लागू किया गया. इसी कारण 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस मनाया जाता है.
    • 26 नवम्बर, 1949 को पारित भारतीय संविधान में 22 भाग, 395 अनुच्छेद तथा 8 अनुसूचियां थी.
    • संविधान में अब 25 भाग, 448 अनुच्छेद तथा 12 अनुसूचियां है.
    • भारतीय संविधान का लगभग दो-तिहाई भाग "भारत शासन अधिनियम 1935" से लिया गया है.
    • संविधान की प्रस्तावना ('हम भारत के लोग.......') को संविधान की कुंजी कहा जाता है. संविधान की प्रस्तावना संविधान के उद्देश्यों व आदर्शों को व्यक्त करती है.
    • संविधान के 42वें संशोधन अधिनियम 1976 के द्वारा इसमें 'पंथ निरपेक्ष' तथा 'समाजवादी' एवं 'अखंडता' शब्द जोड़े गये.
    • भारतीय संविधान में 12 अनुसूचियों का उल्लेख है जिसे इस प्रकार देख सकते है-
      1. प्रथम अनुसूची – इसमें भारतीय संघ के राज्यों एवं संघ शासित क्षेत्रों का उल्लेख है.
      2. सरी अनुसूची – इसमें भारतीय राजव्यवस्था के विभिन्न पदाधिकारियों को प्राप्त होने वाले वेतन, भत्ते, और पेंशन आदि का उल्लेख किया गया है.
      3. तीसरी अनुसूची – इसमें विभिन्न पदाधिकारियों द्वारा पद ग्रहण के समय ली जाने वाली शपथ का उल्लेख है.
      4. चौथी अनुसूची – इसमें विभिन्न राज्यों तथा संघीय क्षेत्रों की राज्यसभा में प्रतिनिधित्व का विवरण दिया गया है.
      5. पांचवी अनुसूची – इसमें विभिन्न अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजाति के प्रशासन और नियंत्रण के बारे में उल्लेख है.
      6. छठी अनुसूची – इसमें असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम राज्यों के जनजाति क्षेत्रों के प्रशासन के बारे में प्रावधान है.
      7. सातवी अनुसूची – इसमें केंद्र एवं राज्यों के बीच शक्तियों के बटवारे के बारे में उल्लेख है. इसके अंतर्गत तीन सूचियाँ है: संघ सूची, राज्य सूची एवं समवर्ती सूची-
    a)     संघ सूची:- इस सूची में मूल रूप से 97 (अब 98) विषय थे. इन विषय पर क़ानून बनाने का अधिकार केवल संसद को है. प्रमुख विषय है: प्रतिरक्षा, विदेश सम्बन्ध, युद्ध एवं शांति, यातायात तथा संचार, रेलवे, डाक व तार, नोट व मुद्रा, बीमा, बैंक, विदेशी व्यापर, जहाजरानी, विमान सेवाए आदि.
    b)    राज्य सूची:- राज्य सूची में 61 विषय है. राज्य सूची में दिए गए विषयों पर कानून बनाने का धिकार राज्य विधानमंडल को है. इस सूची में सार्वजनिक व्यवस्था, पुलिस व जेल, स्थानीय सरकार, सार्वजनिक स्वास्थ्य, सड़के, पुल, उद्दोग, पशुओ तथा गाड़ियों पर टैक्स, विलासिता तथा मनोरंजन पर कर सम्बन्धी विषय आते है.
    c)     समवर्ती सूची:- समवर्ती सूची के मुख्य 52 विषय है. इस सूची में विषय है: विवाह-विच्छेद, दंड निधि, दीवानी कानून, न्याय, समाचार पत्र, पुस्तके तथा छापाखाना, बिजली, आर्थिक व सामाजिक योजना,कारखाने आदि. इन राज्यों पर संघ व राज्य दोनों को कानून बनाने का अधिकार है, किन्तु दोनों में मतभेद होने पर संघीय कानून को प्राथमिकता मिलेगी.
    8.      आठवी अनुसूची –  इसमें भारत की 22 भाषाओ का उल्लेख किया गया है.
    9.      नौवी अनुसूची –  संविधान में यह अनुसूची प्रथम संविधान अधिनियम, 1951 द्वारा जोड़ी गयी. इसके अंतर्गत राज्य द्वारा संपत्ति के अधिग्रहण की विधियों का उल्लेख किया गया है.
    10.  दसवीं अनुसूची –  यह संविधान में 52वें संशोधन 1985 द्वारा जोड़ी गयी. इसमें दल-बदल से सम्बंधित प्रावधानोंका उल्लेख है.
    11.  ग्यारहवी अनुसूची –  इसमें पंचायत राज संस्थाओं को कार्य करने के लिए 29 विषय प्रदान किये गये है.
    12.  बारहवी अनुसूची –  यह अनुसूची संविधान में 74वें संवैधानिक संशोधन (1993) द्वारा जोड़ी गयी. इसमें शहरी क्षेत्र को स्थानीय स्वशासन संस्थाओं को कार्य करने के लिए 18 विषय दिए गये है.

    • संविधान के द्वारा नागरिको को मौलिक अधिकार भी प्रदान किये गए है. संविधान के 24 अनुच्छेदों (12-35) में मौलिक अधिकारों का वर्णन है. भारतीय संविधान द्वारा नागरिको को 7 मौलिक अधिकार प्रदान किये गये थे, किन्तु 44वें संवैधानिक संशोधन द्वारा 20 जून, 1979 में संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों की सूची से हटा दिया गया व इसे केवल एक कानूनी अधिकार बना दिया गया.
    • संविधान में नागरिकों के मूल कर्तव्यों का भी उल्लेख किया गया है. 11 मूल कर्तव्य का वर्णन संविधान में है.
    • संविधान में राज्य के नीति- निदेशक सिद्धांत का वर्णन भाग-4 में (अनुच्छेद 36-51 तक) किया गया है.
    • संविधान के अनुच्छेद 79 के अनुसार संघ के लिए संसद होगी, जो राष्ट्रपति और दोनों सदनों-राज्यसभा व लोकसभा से मिलकर बनेगी. इसी अनुच्छेद में राष्ट्रपति को संसद का अभिन्न अंग बनाया गया है.
    • भारत में लोकतान्त्रिक व्यवस्था को बनाये रखने के लिए न्यायपालिका की व्यवस्था की गयी है.
    • इसी के साथ-साथ संविधान में राज्यपाल, राज्य कार्यपालिका, भारत का महान्यायवादी, नियंत्रक व महालेखा परीक्षक, संघ लोक सेवा आयोग, वित्त आयोग व निर्वाचन आयोग जैसी संविधानिक संस्थाओं की व्यवस्था भी की गयी है. 
      
               राष्ट्र
            विविध स्रोत
    संयुक्त राज्य अमेरिका
    मौलिक अधिकार, न्यायिक पुनर्विलोकन, संविधान की सर्वोच्चता, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, निर्वाचित राष्ट्रपति एवं उस पर महाभियोग, उपराष्ट्रपति का पद, उच्चतम एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को हटाने की विधि एवं वित्तीय आपात।
    ब्रिटेन
    संसदीय शासन प्रणाली, औपचारिक प्रधान के रूप में राष्ट्रपति, मंत्रीमंडल का लोकसभा के प्रति सामूहिक उत्तरदायित्व, एकल नागरिकता व विधि निर्माण प्रक्रिया।

    आयरलैंड
    नीति निर्देशक तत्व, राष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल की व्यवस्था, आपातकालीन उपबंध।
    ऑस्ट्रेलिया
    प्रस्तावना की भाषा, समवर्ती सूची का प्रावधान, केंद्र व राज्यों की बीच सम्बन्ध तथा शक्तियों का विभाजन।
    सोवियत संघ (रूस)
    जापान
    विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया।
    फ्रांस
    गणतंत्रात्मक शासन पद्धति।
    कनाडा
    संघात्मक शासन व्यवस्था एवं अवशिष्ट शक्तियों का केंद्र के पास होना।
    दक्षिण अफ्रीका
    संविधान संशोधन की प्रक्रिया का प्रावधान।
    जर्मनी
    आपातकाल के प्रवर्तन के दौरान राष्ट्रपति को मौलिक अधिकारों से सम्बंधित शक्तियां।



    संसद का विवरण

    parliament
    • भारत की केंद्रीय व्यवस्थापिका  को संसद खा जाता है. भारतीय संसद के 3 अंग है - राष्ट्रपति, राज्यसभा और लोकसभा.
    • संसद के ऊपरी या उच्च सदन को राज्य सभा तथा निम्न सदन को लोकसभा खा जाता है.
    • भारतीय संसद के दोनों सदनों का विवरण नीचे विस्तार से दिया जा रहा है.

    Important Financial Terminologies (आर्थिक शब्दावलियाँ)



    Repo Rate (रेपो दर):-  अल्पकालिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु जिस ब्याज दर पर वाणिज्यिक बैंक (commercial bank) रिज़र्व बैंक (Reserve Bank) से नकदी ऋण प्राप्त करते है, ‘रेपो दर’ कहलाता है.

    Bank Rate (बैंक दर):-  जिस सामान्य ब्याज दर पर Reserve Bank द्वारा commercial bank को पैसा उधार दिया जाता है, बैंक दर कहलाता है. इसके माध्यम से Reserve Bank द्वारा साख नियंत्रण/क्रेडिट conrtol किया जाता है.

    Reverse Repo Rate (रिवर्स रेपो दर):-  बैंकों द्वारा अपनी अतिरिक्त राशि को Reserve Bank में जमा करने पर रिवर्स रेपो दर से ब्याज मिलता है.

    Cash Reserve Ratio (नकद आरक्षित अनुपात):-  C.R.R (Cash Reserve Ratio) किसी Commercial Bank में कुल जमा राशि का वह भाग है जिसे Reserve Bank के पास अनिवार्य रूप से जमा करना पड़ता है. इसकी दर जितनी ऊँची होती है बैंकों की साख सृजन क्षमता उतनी ही कम होती है.

    G.S.T (वस्तु एवं सेवा कर)

    •  GST एक अप्रत्यक्ष कर है, जो देशभर में वस्तुवो और सेवाओं की आपूर्ति पर विनिर्माता से उपभोगताओं तक एकल कर होगा जिससे पूरा देश एक एकीकृत साझा व्यापर में परिवर्तित हो सकेगा.
    • उत्पादन के प्रत्येक चरण में भुगतान किये गए इनपुट करों का लाभ मूल्य संवर्द्धन के बाद के चरण में उपलब्ध होगा. इस प्रकार उत्पादन के प्रत्येक स्तर पर केवल “वैल्यू एडिसन” पर ही यह कर देना होगा.
    • GST के लागू होने से केंद्रीय करों में से केंद्रीय उत्पाद शुल्क, अतिरिक्त उत्पाद शुल्क, सेवा कर, एडिशनल कस्टम ड्यूटी, विशेष और अतिरिक्त कस्टम ड्यूटी तथा वस्तुओं व सेवाओं पर लगने वाले सारे सरचार्ज व सैस जहा समाप्त हो चुके है, वही राज्यों, के करों में VAT, मनोरंजन कर, बिक्री कर, खरीद कर, विलासिता कर, लोटर, सट्टे व जुए पर लगने वाले का तथा सरचार्ज व सेस इसमें समाहित हो गए है. इस प्रकार केंद्र, राज्यों व स्थानीय निकायों द्वारा लिए जाने वाले विभिन्न अप्रत्यक्ष करों के स्थान पर एकीकृत GST ही वसूला जा रहा है.
    • कुछ समय बाद वस्तुओ के मूल्य इससे कम होंगे, जिसका सीधा लाभ उपभोगताओं को होगा. सेवाओं के मूल्यों में कुछ वृद्धि इससे होगी.
    • वस्तुओं व सेवाओं की लागत कम होने से भारत के निर्यात को भी बढ़ावा मिलेगा.
    • GST की संरचना दोहरी किस्म की है. केंद्र सरकार द्वारा लगाया व वसूला जाने वाला कर CGST तथा राज्यों की सरकारों लगाया व वसूला जाने वाला कर SGST कहा जायगा.
    • GST के प्रत्येक निर्णय के लिए एक GST परिषद् (GST council) का गठन किया गया है. इस GST परिषद् में केंद्र व राज्य दोनों का प्रतिनिधित्व की व्यवस्था की गयी है. इसका अध्यक्ष केंद्रीय वित्त मंत्री होंगे.
    • केंद्र व राज्य सरकारों दोनों को ही GST के सम्बन्ध में कानून बनाने का अधिकार होगा. 
    • GST के परिणामस्वरूप अगर राज्यों को हानि होती है, तो इसकी भरपाई केंद्र 5 वर्षों तक राज्यों को करेगा.




    पेरिस जलवायु समझौता का अर्थ

    पेरिस जलवायु समझौता U.N.F.C.C.C के भीतर ग्रीन हाउस गैस के उत्सर्जन को कम करने के लिए कई देशो के द्वारा 2015 में किया गया प्रयास का प्रतिफल है. पेरिस समझौते में, प्रत्येक देश ग्लोबल वार्मिंग को कम करने के लिए स्वयं के योगदान को निर्धारित करता है. भारत समेत 171 देशो के प्रतिनिधियों ने पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौते को अपनी मंजूरी देते हुए इस पर हस्ताक्षर किये. जलवायु समझौते के तहत सभी सदस्य देशों ने 21वी सदी में दुनिया के तापमान में वृद्धि को 2 डिग्री से कम स्तर तक सीमित करने का लक्ष्य रखा है. संयुक्त राष्ट्र महासभा के सभागार में भारत की तरफ से उस समय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावडेकर (अब मानव संसाधन विकास मंत्री) ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किये. समझौते पर हस्ताक्षर के बाद सभी देशों को अपने देश की संसद से इस समझौते का अनुमोदन करना होगा. संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने उस अवसर पर कहा था की “ यह इतिहास में एक अहम् क्षण है. आज आप भविष्य से जुड़े एक संधि पत्र पर हस्ताक्षर कर रहे है.”


    ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु समझौता

    पेरिस समझौता बिजली के निर्माण से लेकर अन्य कई चीजों पर कड़ी नज़र रखेगा. जिनमे मुख्य होगा कि किस प्रकार से कुछ चुनिंदा अमीर देश बाढ़, सूखे और तूफ़ान जैसी प्राकृतिक आपदाओं से निबटने में गरीब राष्ट्रों की मदद करते है. वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन मानव जीवन के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ी चुनौती है. 18वी शताब्दी में प्रारंभ हुई औधोगिक क्रांति ने हमे मुख्यतः जीवाश्म ईंधन पर निर्भर बना दिया है और हम बिजली से लेकर कारखानों और कृषि तक पूरी तरह से इसी पर निर्भर है. लेकिन यह ईंधन बहुत बड़ी मात्रा में ऐसी गैसों का उत्सर्जन करते है, जो सूरज की ऊष्मा को पूरी तरह से धरती तक आने देती है. अतः यह ऊष्मा वायुमंडल में कैद हो जाती है, जिससे वायुमंडल का ताप बढ़ रहा है. इसे ही ग्लोबल वार्मिंग कहते है. इसके चलते धरती के तापमान में पहले से ही करीब 1 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो चुकी है. जलवायु परिवर्तन संपूर्ण मानवता के लिए एक बहुत बड़ा खतरा है और पेरिस समझौता इस चुनौती से निबटने के बारे में ही है.      
    ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) से मुकाबला करने की दिशा में इस समझौते को बड़ा कदम माना जा रहा है. विकासशील और विकसित देश धरती के बढ़ते तापमान को कम करने के लिए एक साथ खड़े हुए है. फ़िलहाल ग्रीन-हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटोती के मौर्चे पर काम शुरू करने के लिए दुनिया के देश एकजुट दिख रहे है.

    पेरिस जलवायु समझौते में तय किये गए लक्ष्य

    • सभी देश कार्बन उत्सर्जन में जल्द-से-जल्द कमी लायेंगे.
    • ग्रीन हाउस गैसों और उनके स्रोत के बीच 2020 तक संतुलन बनाया जायगा.
    • वैश्विक तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस पर सीमित करने की कोशिश का लक्ष्य.
    • हर पांच साल में इस दिशा में हुई प्रगति की समीक्षा की जायगी.
    • 2020 तक कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के लिए विकासशील देशों को हर साल 100 अरब डॉलर की मदद दी  जायगी, जिसे और भी बढाया जा सकता है.


    भारत का पक्ष

    संयुक्त राष्ट्र में भारत का पक्ष रखते हुए प्रकाश जावडेकर (उस समय पर्यावरण मंत्री) ने कहा  था कि इस समझौते से विकसित और विकासशील देशों की परीक्षा होगी. गैस उत्सर्जन में कटौती और गरीबी उन्मूलन पर भी देशों की गंभीरता की परख होगी. भारत ने यह भी स्पष्ट करते हुए कहा कि धनी देशों के दशकों के औधोगिक विकास के बाद जलवायु परिवर्तन से लड़ने का बौझ गरीब देशों के कंधो पर नही डाला जा सकता. फ़िलहाल भारत ने हर परिवार को बिजली की आपूर्ति की सरकार की योजना के तहत् 2022 तक अपनी नवीकरणीय विधुत क्षमता चार गुना बढ़ाकर 175 मेगावाट करने की घोषणा की है.  
    जलवायु परिवर्तन की वजह से पुरे विश्व में समस्याएं बढ़ रही है. भारत में इसका प्रभाव हम सीधे तौर पर देख सकते है. प्रदूषण की समस्या से जलवायु पर बहुत प्रभाव पड़ा है. भारत में पिछले कुछ वर्षों से सूखे की वजह से अधिकाँश किसान बर्बादी के कगार पर खड़े है. और सैकड़ो ने तो आत्महत्या कर अपना जीवन ही समाप्त कर लिया है. देश के कई हिस्सों में सूखे की वजह से पानी की समस्या लगातार बनी हुई है. इसके आलावा कई जगह बेमौसम वर्षा ने बाड़ की समस्या पैदा की है.

    भारत द्वारा हर प्रकार से समझौते के अनुसार सहयोग देने का वादा किया जाता रहा है. और आगे भी भारत इसमें अपना सहयोग देने के लिए प्रतिबद्ध है. 

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